अपवर्तन के उदाहरण

हम अपवर्तन को प्रकृति में होने वाली की घटनाओ के आधार पर समझ सकते है।

अपवर्तन के उदाहरण निम्न है

  1. तारो का टिमटिमाना

रात में हमे जब आसमान में देखते है तो हमे तारे दिखाई देते है। वैसे तो तारे आकाश में हमसे बहुत दूर होते है अतः तारो के दूर होने के कारन उनका प्रतिबिम्ब हमारी आखो की रेटिना पर बनता है।

जब तारो का प्रकाश वायुमंडल से संचरित हो रहा होता है तो प्रकाश को वायुमंडल के कई सतहों से होकर गुजरना होता है अतः बार बार ऐसा होने से रेटिना पर प्रतिबिम्ब खिसखता दिखाई देता है। अतः इस कारण से हमे रात में तारे टिमटिमाते दिखाई पड़ते है।

  1. सूर्योदय और सूर्यास्त

सूरज का सही में सूर्योदय होने से पहले ही तथा वास्तविक सूर्योदय के बाद दिखाई पड़ता है।

मतलब जब सूरज क्षितिज के निचे होता है तब भी हमे लगता है कि सूर्योदय हो गया है लेकिन वास्तव में सूर्योदय नहीं हुआ होता है।

अर्थात असल में सूर्योदय तब होता है जब सूर्य क्षितिज की ऊपर हो।

ऐसा ही सूर्यास्त के समय भी होता है।

सूर्योदय और सूर्यास्त दोनों ही अपवर्तन के कारण होता है।

  1. जल में पेंसिल या छड़ का मुड़ा हुआ प्रतीत होना।

जब हम किसी भी पेंसिल को बीकर में डालते है और बाद में पेंसिल को देखने पर हमे पेंसिल मुड़ी हुई लगती है। लेकिन वास्तव में जब हम पेंसिल बीकर में डालते है तो पेंसिल सीधी होती है न की मुड़ी हुई।

पेंसिल का जल में मुड़ा हुआ दिखाई देना भी प्रकाश के अपवर्तन के कारण होता है।

जब सघन माध्यम में रखा बिंदु बिम्ब विरल माध्यम से देखी जाती है तो बिम्ब ऊपर उठा हुआ सा लगता है।

  1. कांच की पट्टिका द्वारा अपवर्तन

जब हम किसी कार्ड बोर्ड पर कांच की स्लैब (पट्टी) रखते है और उस स्लैब के चारो तरफ पेन या पेंसिल से मार्क करते है।

और फिर बाहर दो पिन या माचिस की तिल्ली को लगाते है और उन तिल्लियों को स्लैब से दूसरी तरफ से देखते है और और वह पर भी पिन या तिल्ली लगा देते है।

स्लैब को बोर्ड से हटाते है और सारी पिन या तिल्लियों को हटाते है और वहां पर पेंसिल से मार्क करते है तो हम देखते है कि प्रकाश कांच की पट्टिका में मुड़ जाता है। इससे हम अपवर्तन को बहुत आसानी से समझ सकते है।


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